मूर्ख मनवा काल की चिंता क्यों सताती है सतगुरु अपना साथी है
वह तो हरदम साथी है
मूर्ख मनवा काल की चिंता क्यों सताती है सतगुरु अपना साथी है।
सतगुरु हरदम साथी है।
गयाबन गऊ काट के डाली, कैसी करी ढ़ीठाई ।
कहे सिकंदर से जीवित कर दे तब मानू तेरी खुदाई।।2।।
गऊ बच्चा तत्काल जीवाई, फिर दूध दुहाती है ।
सतगुरु अपना साथी है।
मूर्ख मनवा काल की चिंता क्यों सताती है
सतगुरु अपना साथी है
वह तो हरदम साथी है
मूर्ख मनवा काल की चिंता क्यों सताती है
सतगुरु अपना साथी है।
सतगुरु हरदम साथी है।
इंद्र मति पर काल झपट्टा, सतगुरु करी सहाई।
कमाल कमली जीवित किनहै सत्य कबीर दुहाई।।2।।
सिकंदर की जलन बुझाई वह कहरामाती है
सतगुरु हरदम साथी है।
मूर्ख मनवा काल की चिंता क्यों सताती है
सतगुरु अपना साथी है
वह तो हरदम साथी है
बिजली खान पठान समझाया अब्राहिम सुल्तानी।।2
हिंदू राजा वीर सिंह ने सिख गुरु की मानी।
बेद कतेब कहे एक कहानी,
कोई जात न पाती है...
सतगुरु हरदम साथी है।
मूर्ख मनवा काल की चिंता क्यों सताती है
सतगुरु अपना साथी है
सतगुरु हरदम साथी है।
वह तो हरदम साथी है
मूर्ख मनवा काल की चिंता क्यों सताती है
सतगुरु अपना साथी है।
सतगुरु हरदम साथी है।
जो चाहे सो कर दे
सतगुरु जो चाहे सो कर दे परमेश्वर पढ़ो ना कोई
शेउ धर का शीश चढ़ाया,
पाछे करी रसोई।।
सतगुरु हरदम साथी है।
मूर्ख मनवा काल की चिंता क्यों सताती है सतगुरु
सतगुरु हरदम साथी है।
मूर्ख मनवा काल की चिंता क्यों सताती है सतगुरु
अपना साथी है।
सतगुरु हरदम साथी है।
जगत नाथ का मंदिर बचाया, समुंदर ने चढ़ाई।
साहेब कबीर के तेज के आगे,
फीका पड़ गया भाई।।2।।
विप्र रूप धर देई गवाही,
मेरी नहीं पार बसाती है।।
सतगुरु अपना साथी है।
सतगुरु हरदम साथी है।
मूर्ख मनवा काल की चिंता
क्यों सताती है सतगुरु
सतगुरु अपना साथी है।
वह तो हरदम साथी है।
राज दरबार में साहेब कबीर ने पग पे डालिया पानी।
जगन्नाथ के पांडे के पैर की,
या पड़ेगी अगन बुझानी।
दूत भेजकर पूछी कहानी,
ज्यों की त्यों ही पाती है।
सतगुरु अपना साथी है।
सतगुरु हरदम साथी है।
मूर्ख मनवा काल की चिंता,
क्यों सताती है सतगुरु
सतगुरु अपना साथी है।
वह तो हरदम साथी है
उबलते तेल में बर्तन में डाले,
वो बंदी छोड़ कबीर।।2
शेख तकी कहे मंत्र के तेज से, इसने ठंडी करी तासीर।।
उंगली डाली ना सही पेड़ सिकंदर को मुरझा आ जाती है।।
सतगुरु अपना साथी है।
सतगुरु हरदम साथी है।
मूर्ख मनवा काल की चिंता क्यों सताती है।
सतगुरु अपना साथी है।
साहेब कबीर को काटन चालिया,
वो शेख तकी जलील।
आर पार तलवार निकल जा,
फिर भी समझा नहीं खलील।।2।।
भाग गया ना लाई डील,
साहेब को हांसी आ जाती है।।
सतगुरु अपना साथी है।
सतगुरु हरदम साथी है।
मूर्ख मनवा काल की चिंता
क्यों सताती है सतगुरु
अपना साथी है।
सतगुरु हरदम साथी है।
शेख तकी ने जुल्म गुजारे,
बावन करी बदमाशी,
खूनी हाथी आगे डालें
वह बांध जुड़ अविनाशी।।2।।
हाथी डर से भाग जासी,
ये दुनिया गुण गाती है।।
सतगुरु अपना साथी है।
सतगुरु हरदम साथी है।
मूर्ख मनवा काल की चिंता
क्यों सताती है
सतगुरु अपना साथी है।
सतगुरु हरदम साथी है।
झूठा प्रचार किया किसी मूर्ख ने कबीर करे भंडारा।
दो रोटी का साधन ना था,
भेख जुड़िया अति भारया।।2।।
बन आया केशव बंजारा
वह होता हीमाती है।
सतगुरु अपना साथी है
सतगुरु हरदम साथी है।
मूर्ख मनवा काल की चिंता
क्यों सताती है।
सतगुरु हरदम साथी है।
वह तो हरदम साथी है।
जीवा दत्ता ने सूखे खूंट पर,
लई परीक्षा भारी ।
परमेश्वर कबीर के चरणामृत से,
हरी होगी वह सुखी डारी।।2।।
कबीर वट वो जाता पुकारी दुनिया देखन जाती है।
सतगुरु अपना साथी है।
सतगुरु हरदम साथी है।
मूर्ख मनवा काल की चिंता,
क्यों सताती है।
सतगुरु अपना साथी है।
सतगुरु हरदम साथी है।
रविदास कबीरजी हाथी चढ़ चाले,
संग लेली गणिका माई।
गंगोदक शीशी में भर के,
मदिरा ज्यों पीवे भाई।।2।।
64 लाख ने भक्ति बहाई,
मूर्ख को नहीं प्रतीत आती है।
सतगुरु अपना साथी है
सतगुरु हरदम साथी है
मूर्ख मनवा काल की चिंता
क्यों सताती है।
सतगुरु अपना साथी है।
सतगुरु हरदम साथी है।
गुरु रामदेवानंद जी ने दया करी,
प्याया राम नाम का प्याला। सत्यनाम का मंतर देकर,
यह किया ज्ञान उजियारा।।2।।
चरणों के मा रहे रामपाला,
अब भक्ति मन भाती है,
सतगुरु अपना साथी है।
सतगुरु हरदम साथी है।
मूर्ख मनवा काल की चिंता
क्यों सताती है।
सतगुरु अपना साथी है।
सतगुरु हरदम साथी है।