Wednesday, 20 March 2019

जीव हमारी जाति है, मानव धर्म हमारा। हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई ,धर्म नहीं कोई न्यारा।।


होली (holi)

 होली का त्योहार हमारे देश भारत में मनाये जाने वाला एक प्रमुख त्यौहार है|
 इस दिन सभी लोग मस्ती में सराबोर होकर मौज मानते हैं
रंगो का त्योहार होली भारत के चार बड़े पर्वों में से एक है। यह पर्व फागुनी पूर्णिमा को होलिका दहन के पश्चात् चैत्र कृष्ण प्रतिपदा को धूमधाम से मनाया जाता है। यह रंगों संगीत और प्रेम का पर्व है। सभी लोग इस पर्व में बड़े उत्साह उमंग एवं मस्ती से भाग लेते हैं।


।।जीवन में नवजीवन भरने
ता होली का त्योहार
भ्रातृत्व समता सिखलाते
करते भेंट प्रेमोपहार।।

प्राचीन काल में हिरण्यकश्यप नाम का एक राजा हुआ था। वह स्वयं को परमात्मा कहकर अपनी प्रजा से कहता था कि वह केवल उसी की पूजा की जाए। बेचारी प्रजा क्या करती डरकर उसी की उपासना किया करती थी। उस का पुत्र प्रहलाद- जिसे कभी मुनि नारद ने आकर विष्णु का मंत्र जपने की प्रेरणा दी थी- अपने पिता की बात न मान कर भगवान् विष्णु ही का जप करता रहता था। अपने पुत्र के द्वारा की जाने वाली आज्ञा की यह अवहेलना हिरण्यकश्यप से सहन नहीं हुई और वह अपने पुत्र को मरवाने योजना बनायी। एक दिन उसकी बहिन होलिका-जो आग में जल नहीं सकती थी- प्रहलाद को लेकर जलती चिता में कूद गई। किन्तु प्रह्लाद का बाल-बाँका नहीं हुआ और होलिका भयानक आग में जलकर राख हो गई। इस प्रकार होली के त्योहार को एक भगवान द्वारा भक्त की रक्षा की स्मृति में एवं सत्य की असत्य पर विजय के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है।

यह अभी तक जो हमने आपको बताया है यह आपने काफी बार सुना होगा कि होली क्यों मनाई जाती है पहलाद कौन है होली के दिन कैसे धूमधाम से लोग मस्तियां करते रहते हैं।

लेकिन अभी तक आपको आध्यात्मिक ज्ञान पता नहीं है हम बस होली यूं ही इंजॉय के लिए मना रहे हैं हम यह नहीं सोचते हैं कि पहलाद जी को भगवान ने बचाया,वह भगवान कौन है?
और इतना छोटा सा बच्चा इतनी अच्छी भक्ति कर रहा है कि परमात्मा उससे खुश हुए और हम अपने जीवन में क्या कर रहे हैं 😢





कोई भी इंसान सच्चे मन से भक्ति करता है तो परम पिता परमात्मा स्वयं उसकी रक्षा के लिए आते हैं पहलाद सच्चे मन से भक्ति करता था विष्णु भगवान की, लेकिन उसकी रक्षा करने के लिए कबीर साहेब जो सब के दादा है वह आए थे जब भी कोई सच्चे मन से निस्वार्थ भाव से भक्ति करते हैं तो कबीर साहेब आते हैं और उन्हें लाभ देते हैं उनका कल्याण करते हैं।
विश्व में एक ही सच्चे गुरु है जो है संत रामपाल जी महाराज जो हमें हमारे सभी शास्त्रों के गुढ रहस्य बताते हैं हमें शास्त्रों को खोल खोल कर बताते हैं कि आखिर इन में क्या ज्ञान दिया है।
हमारा मनुष्य जन्म बहुत ही अनमोल है वह हमें परमात्मा ने भक्ति करने के लिए दिया है लेकिन हम उसे व्यर्थ गवा देते हैं 😢
खाने पीने और ऐसे शौक मौज में जिससे कोई फायदा नहीं होता है। परमात्मा किस उद्देश्य से हमें जन्म देते हैं वह उद्देश्य तो हम सब भूल ही चुके हैं

🙇🏼‍♀संत रामपाल जी महाराज ने 🙏🏻सच्चा ज्ञान देकर वापस हमें अपनी मनुष्य जीवन का उद्देश्य याद दिलाया है और बताया है कि हमारे परमात्मा हमें इस काल की जेल से छुड़ाने के लिए बार-बार आते हैं लेकिन हम इतने नालायक हैं कि इतनी आसान भक्ति भी नहीं करते हैं😢 और शौक मौज में उलझे रहते हैं।


सब लोग होली मनाते हैं लेकिन यह नहीं सोचते कि हमें भी प्रहलाद की तरह भक्ति करनी चाहिए ताकि परमात्मा हमारी रक्षा करें

मेरी इन बातों पर आप जरूर विचार करें और पढ़ें ज्ञान गंगा पुस्तक

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"जीने की राह" पुस्तक में वो अनमोल खजाना छुपा हुआ है जिसको पाने के बाद सभी प्रकार की व्यर्थ की इच्छाएं समाप्त हो जाती हैं।

https://news.jagatgururampalji.org/how-to-celebrate-real-holi/
यह ब्लॉग देखे

मरने के बाद जीव के साथ क्या होता है।

जीव हमारी जाति है, मानव धर्म हमारा। हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई ,धर्म नहीं कोई न्यारा।।

मरने के बाद क्या होता है ,????????
श्री गरुण पुराण कि यह बात -.-
मृत्यु एक ऐसा सच है जिसे कोई भी झुठला नहीं सकता ।

मृत्यु के बाद जीवात्मा यमलोक तक किस प्रकार जाती है, इसका विस्तृत वर्णन गरुड़ पुराण में है। किस प्रकार मनुष्य के प्राण निकलते हैं और किस तरह वह पिंडदान प्राप्त कर प्रेत का रूप लेता है।

(इसका वर्णन गरूण पुराण पृष्ट 370 से आगे तक आता है)

* जिस मनुष्य की मृत्यु होने वाली होती है, वह बोल नहीं पाता है। अंत समय में उसमें दिव्य दृष्टि उत्पन्न होती है और वह संपूर्ण संसार को एकरूप समझने लगता है । उसकी सभी इंद्रियां नष्ट हो जाती हैं। वह जड़ अवस्था में आ जाता है, यानी हिलने-डुलने में असमर्थ हो जाता है। इसके बाद उसके मुंह से झाग निकलने लगता है और लार टपकने लगती है । पापी पुरुष के प्राण नीचे के मार्ग से निकलते हैं ।
* मृत्यु के समय दो यमदूत आते हैं । वे बड़े भयानक, क्रोधयुक्त नेत्र वाले तथा पाशदंड धारण किए होते हैं । वे नग्न अवस्था में रहते हैं और दांतों से कट-कट की ध्वनि करते हैं । यमदूतों के कौए जैसे काले बाल होते हैं । उनका मुंह टेढ़ा-मेढ़ा होता है । नाखून ही उनके शस्त्र होते हैं। इन दूतों को देखकर प्राणी भयभीत होकर मलमूत्र त्याग करने लग जाता है। उस समय शरीर से अंगूष्ठमात्र (अंगूठे के बराबर) जीव हा हा शब्द करता हुआ निकलता है।
* यमराज के दूत जीवात्मा के गले में पाश बांधकर यमलोक ले जाते हैं। उस पापी जीवात्मा को रास्ते में थकने पर भी दूत भयभीत करते हैं और उसे नरक में मिलने वाली यातनाओं के बारे में बताते हैं । ऐसी भयानक बातें सुनकर पापात्मा जोर-जोर से रोने लगती है, किंतु उस पर बिल्कुल भी दया नहीं करते हैं ।
* इसके बाद वह अंगूठे के बराबर शरीर यमदूतों से डरता और कांपता हुआ, कुत्तों के काटने से दु:खी अपने पापकर्मों को याद करते हुए चलता है। आग की तरह गर्म हवा तथा गर्म बालू पर वह जीव चल नहीं पाता है । वह भूख-प्यास से भी व्याकुल हो उठता है । उसकी पीठ पर चाबुक मारते हुए उसे आगे ले जाते हैं। वह जीव जगह-जगह गिरता है और बेहोश हो जाता है। उसको अंधकारमय मार्गसे ले जाते हैं।
* यमलोक . पापी जीव को दो- तीन मुहूर्त में ले जाते हैं। इसके बाद उसे भयानक यातना देते हैं। यह भोगने के बाद यमराज की आज्ञा से यमदूत आकाशमार्ग से पुन: उसे उसके घर छोड़ आते हैं।


* घर में आकर वह जीवात्मा अपने शरीर में पुन: प्रवेश करने की इच्छा रखती है, लेकिन यमदूत के पाश से वह मुक्त नहीं हो पाती और भूख-प्यास के कारण रोती है। पुत्र आदि जो पिंड और अंत समय में दान करते हैं, उससे भी प्राणी की तृप्ति नहीं होती, क्योंकि पापी पुरुषों को दान, श्रद्धांजलि द्वारा तृप्ति नहीं मिलती। इस प्रकार भूख-प्यास से बेचैन होकर वह जीव यमलोक जाता है।
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* जिस पापात्मा के पुत्र आदि पिंडदान नहीं देते हैं तो वे प्रेत रूप हो जाती हैं और लंबे समय तक निर्जन वन में दु:खी होकर घूमती रहती है(ध्यान दीजियेगा भूत पूजा पिंड पूजा करना मना किया है गीताजी मे ,इसे करने से ,पिंड दान करने वाला भी भूत बनता है, ये शास्त्र विरुद्ध पूजा है ,ये वर्णन गरूण पुराण अनुसार बताया जारहा है इसलिए इसका लेख लिखा है )। काफी समय बीतने के बाद भी कर्म को भोगना ही पड़ता है, क्योंकि प्राणी नरक यातना भोगे बिना मनुष्य शरीर नहीं प्राप्त होता। मनुष्य की मृत्यु के बाद 10 दिन तक पिंडदान किया जाता है । उस पिंडदान के प्रतिदिन चार भाग हो जाते हैं। उसमें दो भाग तो पंचमहाभूत देह को पुष्टि देने वाले होते हैं, तीसरा भाग यमदूत का होता है तथा चौथा भाग प्रेत खाता है। नवें दिन पिंडदान करने से प्रेत का शरीर बनता है। दसवें दिन पिंडदान देने से उस शरीर को चलने की शक्ति प्राप्त होती है।



• शव को जलाने के बाद पिंड से हाथ के बराबर का शरीर उत्पन्न होता है । वही यमलोक के मार्ग में शुभ-अशुभ फल भोगता है। पहले दिन पिंडदान से मूर्धा (सिर), दूसरे दिन गर्दन और कंधे, तीसरे दिन से हृदय, चौथे दिन के पिंड से पीठ, पांचवें दिन से नाभि, छठे और सातवें दिन से कमर और नीचे का भाग, आठवें दिन से पैर, नवें और दसवें दिन से भूख-प्यास उत्पन्न होती है । यह पिंड शरीर को धारण कर भूख-प्यास से व्याकुल प्रेतरूप में ग्यारहवें और बारहवें दिन का भोजन करता है ।

* यमदूतों द्वारा तेरहवें दिन प्रेत को बंदर की तरह पकड़ लिया जाता है । इसके बाद वह प्रेत भूख-प्यास से तड़पता हुआ यमलोक अकेला ही जाता है। यमलोक तक पहुंचने का रास्ता वैतरणी नदी को छोड़कर छियासी हजार योजन है(इसका प्रमाण गरूण पुराण गीताप्रेस से प्रकाशित  पृष्ट 460 मे है)

। उस मार्ग पर प्रेत प्रतिदिन दो सौ योजन चलता है । इस प्रकार 47 दिन लगातार चलकर वह यमलोक पहुंचता है । मार्ग में सोलह पुरियों को पार कर यमराज के घर जाता है।

* इन सोलह पुरियों के नाम इस प्रकार है - सौम्य, सौरिपुर, नगेंद्रभवन, गंधर्व, शैलागम, क्रौंच, क्रूरपुर, विचित्रभवन, बह्वापाद, दु:खद, नानाक्रंदपुर, सुतप्तभवन, रौद्र, पयोवर्षण, शीतढ्य, बहुभीति । इन सोलह पुरियों को पार करने के बाद प्राणी यमपाश में बंधा मार्ग में हाहाकार करते हुए यमराज पुरी जाता है । ( सोलह पुरियों का वर्णन गरूण पुराण गीताप्रेस से प्रकाशित पृष्ट 427 मे दिया हुआ है)

----------गरीबदास जिकी वाणी  मे नर्ग का वर्णन------------

ये वर्णन गरुड़पुराण के पृष्ट 376 गीताप्रेस से प्रकाशित से

मिलते है तथा आगे लिखे वर्णन से भी मिलती है इससे ये साबित होता है कि गरीबदास जिको भी सर्व शास्त्रो का ज्ञान था।। पढ़े गरीबदास जीकी वाणी मे

गरीब, जम किंकर के धाम कूं, साईं न ले
जाय |
 बड़ी भयंकर मार है, सतगुरु करै
सहाय ||
गरीब, कारे कारे किंगरे, नीला जम
का धाम |
 जेते जामे जीव है, नहीं चैन
विश्राम ||
गरीब, है तांबे की धरतरी, चोरासी मध
कुंड |
आदि अंत के जिव जित, होते रुंडक मुंड
||
गरीब, चोरासी जहाँ कुंड हैं, खंभ अनंत
अपार |
करनी भुगते आपनी,
नाना बिधि की मार ||
गरीब, चोदा कोटि भयंकरम,
चोदा मुनि दिवान |
कोटि कोटि ताबै
किये, साईं का फुरमान ||
गरीब, रुधिर भरे जहाँ कुंड हैं,
कुंभी जिनका नाम |
दवारा हैं मुख लोड
का, बड़ा भयंकर धाम ||
गरीब, सो सो योजन कुंड है, गिरद
गता बहु भीर |
कोट्यो जिव उसारिये,
कहिं न पावै थीर ||
गरीब, हाथ पैर जिनके नहीं, नहीं सीस मुख
द्वार | तलछू माछू होत हैं, परै गैब
की मार ||
गरीब, लघुसी बानी कहत हूँ, दीरघ
कही न जाय |
 जम किंकर की मार से, साईं
लेत छुड़ाय ||
गरीब, नीले जिनके होंठ हैं,
काली जिनकी जीभ |
चिसमे जिनके लाल
है, रक्त टपकै पीव ||
गरीब, सूर स्वान के मुख बने, धड़
तो जिनकी देह |
दस्तो जिनके गुर्ज हैं,
मारे निर संदेह ||
गरीब, स्याम वर्ण शंका नही, दागड दुम
खलील |
उरध चुंच मुख काग का, चिसमे
जिनके नील ||
गरीब, शक्ति सरुपी तन धरै, लघु दीरघ
हो जाहिं |
बाहर भीतर मार हैं, तन कूं
बहु विधि खाहिं ||
गरीब, कोटि-कोटि की जोट हैं, कोटि-
कोटि एक संग |।
एका-एकी फिरत है, ऐस भयंकर अंग ||


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Tuesday, 12 February 2019

नशा नाश करता है।


आज के युवाओं 

में नशे के सेवन का प्रचलन बहुत ज्यादा देखने को मिलता है। वह शराब, गुटखा , सीगरेट आदि नशीले पदार्थों का सेवन करते हैं। युवाओं का जीवन अंधकार में है। नशे में रहने वाला व्यक्ति अस्थाई रूप से असंवेदनशील रहता है। जिस व्यक्ति को नशे की लत लग जाती है वह अपनी पारिवारिक, सामाजिक और आर्थिक छवी को खो बैठता है। आज के युवा नशा करने को फैशन और बड़े गर्व की बात समझते हैं। नशे में धुत व्यक्ति अपने ही घर में चोरी तक कर बैठते हैं। नशा बहुत से संगीन अपराधों को जन्म देता है।युवाओं और देश के भविष्य को उज्जवल बनाने के लिए लोगों को नशे के जाल से निकालना होगा। इसके लिए बहुत से नशा मुक्ति केंद्र भी खोले गए हैं। टीवी, पत्रिका आदि के माध्यम से लोगों को नशे से होने वाली हानियों के प्रति जागरूक करना होगा। नशा कर रहें लोगो और नशीले पदार्थ खरीदने और बेचने वालों को सख्त से सख्त सजा दी जानी चाहिए। देश को नशा मुक्त करने के लिए परिवार, समाज और देश को मिलकर कोशिश करनी होगी और नशे में फँस चुके व्यक्ति को प्यार और सहानुभूति से ही नशे से मुक्ति दिलानी होगी।





आज के आधुनिक समस में लोग नशा करने के आदि होते जा रहें हैं। वह शराब, सिगरेट, तंबाकू, चरस आदि नशीले पदार्थों का सेवन करते हैं। नशे ने हमारे पूरे देश को घेर लिया है और लोगों की जिंदगी में अंधकार कर दिया है। ज्यादातर नशे का सेवन युवाओं में देखा जाता है क्योंकि वह विदेशों की संस्कृति को अपनाना चाहते हैं। वह नशा करने को फैशन समझते है और गर्व महसूस करते हैं। नशे के वजह से देश के युवा अंधकार में है और देश का भविष्य भी सुरक्षित नहीं है।
नशा करने वाला व्यक्ति अपना मान सम्मान सब कुछ खो देता है। वह अपनी पारिवारिक, सामाजिक और आर्थिक स्थिति को खराब कर लेता हैं। नशे की लत में पड़कर यह लोग पहले धन देकर नशीले पदार्थ खरीदते हैं। बाद में घर के सामान आदि भी बेचने लगते है। नशे की लत में पड़ा हुआ मनुष्य अस्थाई रूप से असंवेदनशील हो जाता है। नशे की लत के चलते लोग बहुत से अपराधों को भी अंजाम देते हैं। वह चोरी छिपे भी विदेशों से नशीले पदार्थ मंगवाते है। नशा बहुत सी गंभीर बिमारियों को जन्म देता है। इसकी वजह से लीवर और अमाशय कमजोर होता है। कैंसर जैसी गंभीर बिमारियाँ भी इसी से उत्पन्न होती है।
लोगों को नशे से मुक्त करना उनके और देश के भविष्य के लिए बहुत ही जरूरी है। इसके लिए बहुत से नशा मुक्ति केंद्र भी खोले गए है। देश को नशा मुक्त बनाने के लिए हमें और सरकार को मिलकर प्रयास करना होगा। लोगों को नशे से होने वाली हानियों के बारे में जागरूक करना होगा। संचार माध्यम जैसे की टीवी, अखबार और पत्रिकाओं के माध्यम से लोगों को जागरूक किया जाना चाहिए। नशीले पदार्थों का आयात भारत में बंद किया जाना चाहिए।





नशे की लत धीरे-धीरे लोगों में बढ़ती जा रही है लेकिन संत रामपाल जी महाराज की शरण में आने से उनका सत्संग सुनने से व्यक्ति की बुरी लत अपने आप कुछ ही दिनों में छूट जाती है जैसे ही व्यक्ति संत रामपाल जी महाराज जी से उपदेश लेते हैं उनकी करना शराब पीना बुरी लते छूट जाती है नशे के कारण व्यक्ति का शरीर खराब होता ही है उसके साथ साथ घर में भी कलह क्हहेेश हमेशा रहता है उनके परिवार वाले उनसे बहुत परेशान रहते हैं और घर में खुशहाली आ जाती हैं। संत रामपाल जी महाराज के लाखों अनुयाई है वह कोई भी नशा नहीं करते हैं किसी भी प्रकार की कोई भी बुराई नहीं करते हैं



  • तर्ज:- मिलो ना तुम तो हम घबराए मिलो तो आंख चुराएं हमें क्या हो गया है…….
  • नशा न करना मेरे भाई,नशे में आग लगाई,संभल जाओ मेरे भाई।संभल जाओ मेरे भाई।
  • नशा पाप का सगा हैं भाई,सच देता नहीं दिखाई,संभल जाओ मेरे भाई।संभल जाओ मेरे भाई।कुछ ना मिलेगा तुमको,पीकर शराब गुटका खाने से,
  • घर वाले भी तुमको,रोक देंगे से में घर आने से,कहीं सड़क पर सोना होगा तुमको बिना चटाई संभल जाओ मेरे भाई,संभल जाओ मेरे भाई,नशा न करना…………
  • हाथ में बोतल लेकर,चलते हो नागिन जैसी चाल हैं,कपड़े फटे हैं इनके,बिखरे हुए से देखो बाल है ,कोई ना अब पहचाने तुमको हालत कैसे बनाई संभल जाओ मेरे भाई,संभल जाओ मेरे भाई,नशा न करना…………
  • काम धाम कुछ कर लो,कैसे चलेगा घर महंगाई में,बच्चे क्या सोएंगे भूखे,अब किट-किट और लड़ाई मेंबच्चे हैं बुखार में तपते,तुम लाते नहीं दवाई।संभल जाओ मेरे भाई।संभल जाओ मेरे भाई ।नशा न करना………..

Monday, 11 February 2019

करवाचौथ

#karvachoth

करवा चौथ का व्रत कुछ ही सालों में चलन में आया है पहले के बुजुर्ग तो इसमे समझते ही नहीं थे,,  लेकिन 21वीं सदी में भी खूब पाखंड ने जन्म लिया है जबकि धर्म गुरुओं की बाढ़ सी आई हुई है जब हमारे शास्त्र व्रत करने को मना कर रहे हैं फिर यह करवा चौथ व्रत कहां से प्रारंभ हो गया सूक्ष्म वेद मैं करवा चौथ का व्रत करने वाली आत्मा गधी बनती है अगले जन्म में ,,और भूखा मरना पति की आयु नहीं बढ़ाता है कई महिलाएं करवा चौथ के दिन ही विधवा हो जाती है फिर वह करवा चौथ कहां काम आयाlhttps://news.jagatgururampalji.org/gallery/

Sunday, 10 February 2019

दहेज :एक कुप्रथा

दहेज प्रथा आज के युग में एक बुराई का रूप धारण कर चुकी है। आज के समय में दहेज प्रेम पूर्वक देने की नहीं बल्कि अधिकार पूर्वक लेने की वस्तु बनता जा रहा है। आधुनिक युग में कन्या को उसकी श्रेष्ठता और शील-सौंदर्य से नहीं बल्कि उसकी दहेज की मात्रा से आँका जाता है।

आज के समय में कन्या की कुरूपता और कुसंस्कार दहेज के आवरण की वजह से आच्छादित हो गये हैं आज के समय में खुले आम वर की बोली लगाई जाती है। दहेज में राशि से परिवारों का मुल्यांकन किया जाता है। पूरा समाज जिसे ग्रहण कर लेता है वह दोष नहीं गुण बन जाता है।
इसी के परिणाम स्वरूप दहेज एक सामाजिक विशेषता बन गयी है। दहेज प्रथा जो शुरू में एक स्वेच्छा और स्नेह से देने वाली भेंट होती थी आज वह बहुत ही विकट रूप धारण कर चुकी है। आज के समय में वर पक्ष के लोग धन-राशि और अन्य कई तरह की वस्तुओं का निश्चय करके उन्हें दहेज में मांगते हैं और जब उन्हें दहेज मिलने का आश्वासन मिल जाता है तभी विवाह पक्का किया जाता है।
इसी वजह से लडकी की खुशी के लिए लडके वालों को खुश करने के लिए ही दहेज दिया जाता है। आज के समय में लोग धन का हिसाब लगाते हैं कि इतने सालों से हर महीने का कितना रुपया जमा होगा।समाज में विकास और सामाजिक जीवन की शुरुआत के लिए विवाह को एक पावन और अनिवार्य बंधन के रूप में स्वीकार किया गया है। वैवाहिक जीवन में नर-नारी एक-दूसरे के पूरक बनकर जीवन को और मधुर बनाते हैं और भारतीय संस्कृति में जो पितृ ऋण होता है उसे वंश वृद्धि के रूप में बढ़ाते हैं।
एक पुरुष के जीवन में स्त्री शीतल जल की तरह होती है जो उसके जीवन को अपने प्यार और सहयोग से सुखी और शांतिपूर्ण बनाती है। लेकिन आज भारत के समाज में जो अनेक कुरीतियाँ फैली हुई हैं वो सब भारत के गौरवशाली समाज पर एक कलंक के समान हैं।

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जाति, छूआछूत और दहेज जैसी प्रथाओं की वजह से ही विश्व के उन्नत समाज में रहने पर भी हमारा सिर शर्म से झुक जाता है। समय-समय से कई लोग और राजनेता इसे खत्म करने की कोशिश करते रहते हैं लेकिन इसका पूरी तरह से नाश नहीं हो पाया है। दहेज प्रथा दिन-ब-दिन और अधिक भयानक होती जा रही है।


















(यह एक बुराई है)
दहेज प्रथा आज के युग में एक बुराई का रूप धारण कर चुकी है। आज के समय में दहेज प्रेम पूर्वक देने की नहीं बल्कि अधिकार पूर्वक लेने की वस्तु बनता जा रहा है। आधुनिक युग में कन्या को उसकी श्रेष्ठता और शील-सौंदर्य से नहीं बल्कि उसकी दहेज की मात्रा से आँका जाता है।
आज के समय में कन्या की कुरूपता और कुसंस्कार दहेज के आवरण की वजह से आच्छादित हो गये हैं आज के समय में खुले आम वर की बोली लगाई जाती है। दहेज में राशि से परिवारों का मुल्यांकन किया जाता है। पूरा समाज जिसे ग्रहण कर लेता है वह दोष नहीं गुण बन जाता है।
इसी के परिणाम स्वरूप दहेज एक सामाजिक विशेषता बन गयी है। दहेज प्रथा जो शुरू में एक स्वेच्छा और स्नेह से देने वाली भेंट होती थी आज वह बहुत ही विकट रूप धारण कर चुकी है। आज के समय में वर पक्ष के लोग धन-राशि और अन्य कई तरह की वस्तुओं का निश्चय करके उन्हें दहेज में मांगते हैं और जब उन्हें दहेज मिलने का आश्वासन मिल जाता है तभी विवाह पक्का किया जाता है।
इसी वजह से लडकी की खुशी के लिए लडके वालों को खुश करने के लिए ही दहेज दिया जाता है।आज के समय में लोग धन का हिसाब लगाते हैं कि इतने सालों
से हर महीने का कितना रुपया जमा होगा।













दहेज प्रथा के दुष्परिणाम : दहेज प्रथा की वजह से ही बाल विवाह, अनमेल विवाह, विवाह विच्छेद जैसी प्रथाओं ने फिर से समाज में अपना अस्तित्व स्थापित कर लिया है। दहेज प्रथा की वजह से कितनी बड़ी-बड़ी समस्याएं आ रही हैं इसका अनुमान भी नहीं लगाया जा सकता है।
जन्म से पहले ही गर्भ में लडकी और लडकों की जाँच की वजह से लडकियों को गर्भ में ही मरवा देते हैं जिसकी वजह से लडकों और लडकियों का अनुपात असंतुलित हो गया है। लडकियों के माता-पिता दूसरों की तरह दहेज देने की वजह से कर्ज में डूब जाते हैं और अपनी परेशानियों को और अधिक बढ़ा देते हैं।
लडके वाले अधिक दहेज मांगना शुरू कर देते हैं और दहेज न मिलने पर नवविवाहिता को तंग करते हैं और उसे जलाकर मारने की भी कोशिश करते हैं। कभी-कभी लडकी यह सब सहन नहीं कर पाती है और आत्महत्या करने के लिए विवश हो जाती है या फिर तलाक देने के लिए मजबूर हो जाती है।
दहेज न होने की वजह से योग्य कन्या को अयोग्य वर को सौंप दिया जाता है। जो कन्याएं अयोग्य होती हैं वे अपने धन के बल पर योग्य वरों को खरीद लेती हैं। माता-पिता अपने बच्चों की खुशी के लिए गैर कानूनी काम भी करने से पीछे नहीं हट पाते हैं। आज के समय में लडकों और लडकियों की खुले आम नीलामी की जाती है।
दहेज प्रथा का समाधान : अगर दहेज प्रथा को खत्म करना है तो उसके लिए खुद युवकों को आगे बढना चाहिए। उन्हें अपने माता-पिता और सगे संबंधियों को बिना दहेज के शादी करने के लिए स्पष्ट रूप से समझा देना चाहिए। जो लोग नवविवाहिता को शारीरक और मानसिक कष्ट देते हैं युवकों को उनका विरोध करना चाहिए।
ऐसे करवाते  है रमैनी(शादी)


दहेज प्रथा को समाप्त करने के लिए संत रामपाल जी महाराज जी ने एक बहुत सराहनीय कदम उठाया है वह अपने सभी अनुयायियों की, जो भी शादी करना चाहते हैं उनकी दहेज मुक्त शादियां करवाते हैं और अपने अनुयायियो को यही शिक्षा देते हैं कि ना ही हमें दहेज देना है और ना ही हमें दहेज लेना है।


 संत रामपाल जी महाराज की इस नई पहल से समाज सुधार हो रहा है और इस तरह से बहुत ही आसान तरीके से शादी हो जाती हैं और वह खुशी खुशहाल जीवन जीते हैं।

जिसने तेरी रक्षा जठराग्नि में की वह है पूर्ण परमात्मा वह है समरथ साहेब।

जिसने तेरी रक्षा जठराग्नि में की वह है पूर्ण परमात्मा वह है समरथ साहेब।  मां के कोख में जहां बच्चा पलता है वहां उसकी कोई और रक्षा नही...