दहेज प्रथा आज के युग में एक बुराई का रूप धारण कर चुकी है। आज के समय में दहेज प्रेम पूर्वक देने की नहीं बल्कि अधिकार पूर्वक लेने की वस्तु बनता जा रहा है। आधुनिक युग में कन्या को उसकी श्रेष्ठता और शील-सौंदर्य से नहीं बल्कि उसकी दहेज की मात्रा से आँका जाता है।
आज के समय में कन्या की कुरूपता और कुसंस्कार दहेज के आवरण की वजह से आच्छादित हो गये हैं आज के समय में खुले आम वर की बोली लगाई जाती है। दहेज में राशि से परिवारों का मुल्यांकन किया जाता है। पूरा समाज जिसे ग्रहण कर लेता है वह दोष नहीं गुण बन जाता है।
इसी के परिणाम स्वरूप दहेज एक सामाजिक विशेषता बन गयी है। दहेज प्रथा जो शुरू में एक स्वेच्छा और स्नेह से देने वाली भेंट होती थी आज वह बहुत ही विकट रूप धारण कर चुकी है। आज के समय में वर पक्ष के लोग धन-राशि और अन्य कई तरह की वस्तुओं का निश्चय करके उन्हें दहेज में मांगते हैं और जब उन्हें दहेज मिलने का आश्वासन मिल जाता है तभी विवाह पक्का किया जाता है।
इसी वजह से लडकी की खुशी के लिए लडके वालों को खुश करने के लिए ही दहेज दिया जाता है। आज के समय में लोग धन का हिसाब लगाते हैं कि इतने सालों से हर महीने का कितना रुपया जमा होगा।समाज में विकास और सामाजिक जीवन की शुरुआत के लिए विवाह को एक पावन और अनिवार्य बंधन के रूप में स्वीकार किया गया है। वैवाहिक जीवन में नर-नारी एक-दूसरे के पूरक बनकर जीवन को और मधुर बनाते हैं और भारतीय संस्कृति में जो पितृ ऋण होता है उसे वंश वृद्धि के रूप में बढ़ाते हैं।
जाति, छूआछूत और दहेज जैसी प्रथाओं की वजह से ही विश्व के उन्नत समाज में रहने पर भी हमारा सिर शर्म से झुक जाता है। समय-समय से कई लोग और राजनेता इसे खत्म करने की कोशिश करते रहते हैं लेकिन इसका पूरी तरह से नाश नहीं हो पाया है। दहेज प्रथा दिन-ब-दिन और अधिक भयानक होती जा रही है।
(यह एक बुराई है)
दहेज प्रथा आज के युग में एक बुराई का रूप धारण कर चुकी है। आज के समय में दहेज प्रेम पूर्वक देने की नहीं बल्कि अधिकार पूर्वक लेने की वस्तु बनता जा रहा है। आधुनिक युग में कन्या को उसकी श्रेष्ठता और शील-सौंदर्य से नहीं बल्कि उसकी दहेज की मात्रा से आँका जाता है।
आज के समय में कन्या की कुरूपता और कुसंस्कार दहेज के आवरण की वजह से आच्छादित हो गये हैं आज के समय में खुले आम वर की बोली लगाई जाती है। दहेज में राशि से परिवारों का मुल्यांकन किया जाता है। पूरा समाज जिसे ग्रहण कर लेता है वह दोष नहीं गुण बन जाता है।
इसी के परिणाम स्वरूप दहेज एक सामाजिक विशेषता बन गयी है। दहेज प्रथा जो शुरू में एक स्वेच्छा और स्नेह से देने वाली भेंट होती थी आज वह बहुत ही विकट रूप धारण कर चुकी है। आज के समय में वर पक्ष के लोग धन-राशि और अन्य कई तरह की वस्तुओं का निश्चय करके उन्हें दहेज में मांगते हैं और जब उन्हें दहेज मिलने का आश्वासन मिल जाता है तभी विवाह पक्का किया जाता है।
इसी वजह से लडकी की खुशी के लिए लडके वालों को खुश करने के लिए ही दहेज दिया जाता है।आज के समय में लोग धन का हिसाब लगाते हैं कि इतने सालों
से हर महीने का कितना रुपया जमा होगा।
दहेज प्रथा के दुष्परिणाम : दहेज प्रथा की वजह से ही बाल विवाह, अनमेल विवाह, विवाह विच्छेद जैसी प्रथाओं ने फिर से समाज में अपना अस्तित्व स्थापित कर लिया है। दहेज प्रथा की वजह से कितनी बड़ी-बड़ी समस्याएं आ रही हैं इसका अनुमान भी नहीं लगाया जा सकता है।
जन्म से पहले ही गर्भ में लडकी और लडकों की जाँच की वजह से लडकियों को गर्भ में ही मरवा देते हैं जिसकी वजह से लडकों और लडकियों का अनुपात असंतुलित हो गया है। लडकियों के माता-पिता दूसरों की तरह दहेज देने की वजह से कर्ज में डूब जाते हैं और अपनी परेशानियों को और अधिक बढ़ा देते हैं।
लडके वाले अधिक दहेज मांगना शुरू कर देते हैं और दहेज न मिलने पर नवविवाहिता को तंग करते हैं और उसे जलाकर मारने की भी कोशिश करते हैं। कभी-कभी लडकी यह सब सहन नहीं कर पाती है और आत्महत्या करने के लिए विवश हो जाती है या फिर तलाक देने के लिए मजबूर हो जाती है।
दहेज न होने की वजह से योग्य कन्या को अयोग्य वर को सौंप दिया जाता है। जो कन्याएं अयोग्य होती हैं वे अपने धन के बल पर योग्य वरों को खरीद लेती हैं। माता-पिता अपने बच्चों की खुशी के लिए गैर कानूनी काम भी करने से पीछे नहीं हट पाते हैं। आज के समय में लडकों और लडकियों की खुले आम नीलामी की जाती है।
दहेज प्रथा का समाधान : अगर दहेज प्रथा को खत्म करना है तो उसके लिए खुद युवकों को आगे बढना चाहिए। उन्हें अपने माता-पिता और सगे संबंधियों को बिना दहेज के शादी करने के लिए स्पष्ट रूप से समझा देना चाहिए। जो लोग नवविवाहिता को शारीरक और मानसिक कष्ट देते हैं युवकों को उनका विरोध करना चाहिए।
ऐसे करवाते है रमैनी(शादी)
दहेज प्रथा को समाप्त करने के लिए संत रामपाल जी महाराज जी ने एक बहुत सराहनीय कदम उठाया है वह अपने सभी अनुयायियों की, जो भी शादी करना चाहते हैं उनकी दहेज मुक्त शादियां करवाते हैं और अपने अनुयायियो को यही शिक्षा देते हैं कि ना ही हमें दहेज देना है और ना ही हमें दहेज लेना है।
संत रामपाल जी महाराज की इस नई पहल से समाज सुधार हो रहा है और इस तरह से बहुत ही आसान तरीके से शादी हो जाती हैं और वह खुशी खुशहाल जीवन जीते हैं।