Sunday, 19 April 2020

सच्चा सतगुरु | sacha satguru: Supreme Knowledge

सच्चा सतगुरु 




  • पवित्र वेदों व गीता जी आदि पवित्र सदग्रंथों में प्रमाण मिलता है कि जब-जब धर्म की हानि होती है व अधर्म की वृद्धि होती है तब परमेश्वर स्वयं आकर या अपने परम संत यानी सच्चे सतगुरु को भेजकर सत्य ज्ञान के द्वारा धर्म की पुनर्स्थापना करता है
         वर्तमान में संत रामपाल जी महाराज द्वारा ही सत्य ज्ञान दिया जा रहा है।
  • श्रीमद्भगवत गीता अध्याय 15 श्लोक 1 - 4, 16, 17 में कहा गया है जो संत इस संसार रूपी उल्टे लटके हुए वृक्ष के सभी विभाग बता देगा वह पूर्ण गुरु/सच्चा सद्गुरु है। यह तत्वज्ञान केवल संत रामपाल जी महाराज ही बता रहे हैं।
  • यजुर्वद अध्याय 19 मन्त्र 25 के अनुसार तत्वदर्शी संत वह होता है जो वेदों के सांकेतिक शब्दों को पूर्ण विस्तार से वर्णन करता है जिससे पूर्ण परमात्मा की प्राप्ति होती है।ऐसा केवल संत रामपाल जी महाराज ही कर रहे हैं।
  • पूर्ण संत तीन प्रकार के मंत्रों को तीन बार में उपदेश करेगा जिसका वर्णन कबीर सागर ग्रंथ पृष्ठ 265 पर बोध सागर में मिलता है। गीता जी के अध्याय 17 श्लोक 23 व सामवेद संख्या 822 में मिलता है।संत रामपाल जी महाराज ही वह पूर्ण संत हैं जो तीन प्रकार के मंत्रों का तीन बार में उपदेश करते हैं।
  • सच्चा सतगुरु वही है जो गीता अध्याय 16 के श्लोक 23, 24 के अनुसार भक्त समाज को शास्त्र अनूकूल भक्ति साधना बताए। शास्त्र अनूकूल भक्ति साधना केवल संत रामपाल जी महाराज के पास ही मौजूद है।
  • सच्चा सतगुरु वो है जो हमारे सभी धर्मों के सदग्रन्थों से प्रमाणित ज्ञान व सतभक्ति देकर मोक्ष दिला दे।मोक्षदायक भक्ति केवल संत रामपाल जी महाराज के पास ही है।
  • पूर्ण गुरु जब सत्य ज्ञान का प्रचार करता है तो सभी नकली गुरु जनता द्वारा उसका विरोध करा देते हैं। जबकि पूर्ण गुरु का ज्ञान शास्त्र प्रमाणित होता है\
ये बातें संत रामपाल जी महाराज पर ही खरी उतरती हैं।




जीव हमारी जाति है, मानव धर्म हमारा।
हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई, धर्म नहीं कोई न्यारा।।
-पूर्ण संत रामपाल जी महाराज
पूर्ण गुरु समाज से जाति व धर्म का भेद मिटाता है।


  • आज तक किसी भी संत ने यह नहीं बताया कि श्रीमद्भगवत गीता जी का ज्ञान काल/ब्रह्म ने श्रीकृष्ण जी के शरीर में प्रवेश करके बोला था। यह भेद केवल पूर्ण संत रामपाल जी ने ही प्रमाण सहित बताया है।
  • वेद कतेब झूठे नाहि, झूठे हैं जो समझे नाहि।पूर्ण गुरु सभी सद्ग्रन्थों का ज्ञाता होता है। सद्ग्रन्थों की पूर्ण जानकारी केवल पूर्ण संत रामपाल जी महाराज के पास ही है।

  • नकली संत कहते हैं कि सद्भक्ति से पापकर्म नहीं कटते, भोगने ही पड़ेंगे। जबकि सच्चे गुरु संत रामपाल जी महाराज सभी शास्त्रों से प्रमाणित करके बताते हैं कि सद्भक्ति से पापकर्म कटते हैं और कैंसर क्या कैंसर का बाप भी ठीक होता है।
  • सच्चा सतगुरु अपने सत्य ज्ञान से स्वच्छ समाज का निर्माण करता है। संत रामपाल जी महाराज के नेतृत्व में पाखण्ड मुक्त, नशा मुक्त, दहेजमुक्त, भ्रष्टाचार मुक्त समाज तैयार हो रहा है।


  • वह संत सभी धर्म ग्रंथों का पूर्ण जानकार होता है।वर्तमान में केवल सतगुरु रामपाल जी महाराज ही हैं जो सभी सद्ग्रन्थों के पूर्ण जानकार हैं, उनके द्वारा बताई गई भक्ति विधि भी पूर्ण रूप से शास्त्रों से प्रमाणित है।
  • संत गरीबदास जी के अनुसार पूर्ण संत की पहचान
  • पूर्ण संत तीन समय की पूजा बताता है। सुबह पूर्ण परमात्मा की पूजा, दोपहर को विश्व के देवताओं का सत्कार व संध्या आरती अलग से बताता है वह जगत का उपकारक संत होता है।वर्तमान में वह पूर्ण संत रामपाल जी महाराज ही है
  • कबीर साहिब अपने प्रिय शिष्य धर्मदास को बताते हैं कि जो मेरा संत सतभक्ति मार्ग को बताएगा उसके साथ सभी संत व महंत झगड़ा करेंगे यह उसकी पहचान होगी।
  • जो मम संत सत उपदेश दृढ़ावे।वाके संग सभी राड बढ़ावे।।
          यह सब बातें सच्चे सतगुरु रामपाल जी महाराज पर ही खरी उतरती हैं।
  • सच्चा सतगुरु वही है जिसके द्वारा बताई गई भक्ति विधि शास्त्र प्रमाणित हो। शास्त्र प्रमाणित भक्ति पूरे विश्व में केवल संत रामपाल जी महाराज के पास ही है।
  • सच्चा सतगुरु वो है जो हमारे सभी धर्मों के सदग्रन्थों से प्रमाणित ज्ञान व सतभक्ति देकर जन्म-मृत्यु से छुटकारा दिला दे। सद्ग्रन्थों पर आधारित भक्ति केवल संत रामपाल जी महाराज ही बताते हैं।

 सतगुरु की पहचान संत गरीबदास जी की वाणी में -
”सतगुरु के लक्षण कहूं, मधुरे बैन विनोद। चार वेद षट शास्त्र, कहै अठारा बोध।।“
पूर्ण संत चारों वेदों, छः शास्त्रों, अठारह पुराणों आदि सभी ग्रंथों का पूर्ण जानकार होगा।
सभी सद्ग्रन्थों के पूर्ण जानकर संत रामपाल जी महाराज हैं जो सतभक्ति देकर मानव को सभी बुराइयों से दूर कर रहे हैं।
पूर्ण संत की पहचान

पूर्ण संत भिक्षा व चंदा मांगता नहीं फिरेगा।


*पवित्र सदग्रन्थों जैसे श्रीमद्भगवद गीता जी, वेद, गुरु ग्रंथ साहेब, बाइबिल, कुरान से कबीर साहेब जी को परमात्मा सिद्ध करने वाले संत रामपाल जी महाराज ही पूर्ण तथा सच्चे गुरु हैं।

*यजुर्वेद अध्याय 19 मंत्र 25, 26 में लिखा है कि जो वेदों के अधूरे वाक्यों अर्थात सांकेतिक शब्दों व एक चौथाई श्लोकों को पूरा करके विस्तार से बताएगा व तीन समय की पूजा करवाएगा। वह जगत का उपकारक संत सच्चा सतगुरु होगा।
इस परमार्थ के कार्य को केवल संत रामपाल जी महाराज ही कर रहे हैं।
*पूर्ण गुरु के लक्षण
पूर्ण संत सर्व वेद-शास्त्रों का ज्ञाता होता है।
दूसरे वह मन-कर्म-वचन से यानि सच्ची श्रद्धा से केवल एक परमात्मा समर्थ की भक्ति स्वयं करता है तथा अपने अनुयाईयों से करवाता है।
तीसरे वह सब अनुयाईयों से समान व्यवहार (बर्ताव) करता है।
चौथे उसके द्वारा बताया भक्ति
कर्म वेदों में वर्णित विधि के अनुसार होता है।
*कुरान ज्ञान दाता हजरत मुहम्मद जी को कहता है कि उस अल्लाह की जानकारी किसी बाख़बर इल्मवाले संत से पूछो।
वह बाख़बर इल्मवाले संत रामपाल जी महाराज हैं जो अल्लाह की सम्पूर्ण जानकारी रखते हैं।
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Tuesday, 14 April 2020

सतगुरु अपना साथी है

मूर्ख मनवा काल की चिंता क्यों सताती है सतगुरु अपना साथी है
वह तो हरदम साथी है
मूर्ख मनवा काल की चिंता क्यों सताती है सतगुरु अपना साथी है।
सतगुरु हरदम साथी है।

गयाबन गऊ काट के डाली, कैसी करी ढ़ीठाई ।
कहे सिकंदर से जीवित कर दे तब मानू तेरी खुदाई।।2।।
गऊ बच्चा तत्काल जीवाई, फिर दूध दुहाती है ।
सतगुरु अपना साथी है।

मूर्ख मनवा काल की चिंता क्यों सताती है 
सतगुरु अपना साथी है
वह तो हरदम साथी है
मूर्ख मनवा काल की चिंता क्यों सताती है 
सतगुरु अपना साथी है।
सतगुरु हरदम साथी है।

इंद्र मति पर काल झपट्टा, सतगुरु करी सहाई।
कमाल कमली जीवित किनहै सत्य कबीर दुहाई।।2।।

सिकंदर की जलन बुझाई वह कहरामाती है 
सतगुरु हरदम साथी है।

मूर्ख मनवा काल की चिंता क्यों सताती है 
सतगुरु अपना साथी है
वह तो हरदम साथी है


बिजली खान पठान समझाया अब्राहिम सुल्तानी।।2
हिंदू राजा वीर सिंह ने सिख गुरु की मानी।
बेद कतेब कहे एक कहानी,
कोई जात न पाती है...

सतगुरु हरदम साथी है।
मूर्ख मनवा काल की चिंता क्यों सताती है 
सतगुरु अपना साथी है
सतगुरु हरदम साथी है।

वह तो हरदम साथी है
मूर्ख मनवा काल की चिंता क्यों सताती है 
सतगुरु अपना साथी है।
सतगुरु हरदम साथी है।

जो चाहे सो कर दे 
सतगुरु जो चाहे सो कर दे परमेश्वर पढ़ो ना कोई 
शेउ धर का शीश चढ़ाया,
 पाछे करी रसोई।।

सतगुरु हरदम साथी है।
मूर्ख मनवा काल की चिंता क्यों सताती है सतगुरु
सतगुरु हरदम साथी है।


मूर्ख मनवा काल की चिंता क्यों सताती है सतगुरु 
अपना साथी है।
सतगुरु हरदम साथी है।

जगत नाथ का मंदिर बचाया, समुंदर ने चढ़ाई।
साहेब कबीर के तेज के आगे,
फीका पड़ गया भाई।।2।।
विप्र रूप धर देई गवाही,
मेरी नहीं पार बसाती है।।

सतगुरु अपना साथी है।
सतगुरु हरदम साथी है।
मूर्ख मनवा काल की चिंता
क्यों सताती है सतगुरु
सतगुरु अपना साथी है।
वह तो हरदम साथी है।

राज दरबार में साहेब कबीर ने पग पे डालिया पानी।
जगन्नाथ के पांडे के पैर की,
या पड़ेगी अगन बुझानी।
दूत भेजकर पूछी कहानी,
ज्यों की त्यों ही पाती है।


सतगुरु अपना साथी है।
सतगुरु हरदम साथी है।
मूर्ख मनवा काल की चिंता,
क्यों सताती है सतगुरु 
सतगुरु अपना साथी है।
वह तो हरदम साथी है


उबलते तेल में बर्तन में डाले,
वो बंदी छोड़ कबीर।।2
शेख तकी कहे मंत्र के तेज से, इसने ठंडी करी तासीर।।

उंगली डाली ना सही पेड़ सिकंदर को मुरझा आ जाती है।।

सतगुरु अपना साथी है।
सतगुरु हरदम साथी है।
मूर्ख मनवा काल की चिंता क्यों सताती है।
सतगुरु अपना साथी है।


साहेब कबीर को काटन चालिया,
वो शेख तकी जलील।
आर पार तलवार निकल जा,
फिर भी समझा नहीं खलील।।2।।

भाग गया ना लाई डील,
साहेब को हांसी आ जाती है।।

सतगुरु अपना साथी है।
सतगुरु हरदम साथी है।
मूर्ख मनवा काल की चिंता 
क्यों सताती है सतगुरु 
अपना साथी है।
सतगुरु हरदम साथी है।

शेख तकी ने जुल्म गुजारे,
बावन करी बदमाशी,
खूनी हाथी आगे डालें 
वह बांध जुड़ अविनाशी।।2।।

हाथी डर से भाग जासी,
ये दुनिया गुण गाती है।।

सतगुरु अपना साथी है।
सतगुरु हरदम साथी है।
मूर्ख मनवा काल की चिंता 
क्यों सताती है
सतगुरु अपना साथी है।
सतगुरु हरदम साथी है।

झूठा प्रचार किया किसी मूर्ख ने कबीर करे भंडारा। 
दो रोटी का साधन ना था,
भेख जुड़िया अति भारया।।2।।
बन आया केशव बंजारा
वह होता हीमाती है।


सतगुरु अपना साथी है
सतगुरु हरदम साथी है।
मूर्ख मनवा काल की चिंता
क्यों सताती है।
सतगुरु हरदम साथी है।
वह तो हरदम साथी है।


जीवा दत्ता ने सूखे खूंट पर,
लई परीक्षा भारी ।
परमेश्वर कबीर के चरणामृत से,
हरी होगी वह सुखी डारी।।2।।

कबीर वट वो जाता पुकारी दुनिया देखन जाती है।

सतगुरु अपना साथी है।
सतगुरु हरदम साथी है।
मूर्ख मनवा काल की चिंता,
क्यों सताती है।
सतगुरु अपना साथी है।
सतगुरु हरदम साथी है।

रविदास कबीरजी हाथी चढ़ चाले,
संग लेली गणिका माई।
गंगोदक शीशी में भर के,
मदिरा ज्यों पीवे भाई।।2।।

64 लाख ने भक्ति बहाई,
मूर्ख को नहीं प्रतीत आती है।

सतगुरु अपना साथी है 
सतगुरु हरदम साथी है 
मूर्ख मनवा काल की चिंता 
क्यों सताती है।
सतगुरु अपना साथी है।
सतगुरु हरदम साथी है।

गुरु रामदेवानंद जी ने दया करी,
प्याया राम नाम का प्याला। सत्यनाम का मंतर देकर,
यह किया ज्ञान उजियारा।।2।।

चरणों के मा रहे रामपाला,
अब भक्ति मन भाती है,

सतगुरु अपना साथी है।
सतगुरु हरदम साथी है।
मूर्ख मनवा काल की चिंता 
क्यों सताती है।
सतगुरु अपना साथी है।
सतगुरु हरदम साथी है।

मन मान जा बुढ़ापा आवेगा

तो परमात्मा क्या बताते हैं।

मन मान जा बुढ़ापा आवेगा।
मन मान जा बुढ़ापा आवेगा।

यानी भक्ति नहीं करते उनके विषय में बता रहे हैं।

बिना भजन तेरी हुए दुर्गति,
तू पड़या पड़या पछताएगा।

मन मान जा बुढ़ापा आवेगा।
मन मान जा बुढ़ापा आवेगा।

भाई बचपन गया जवानी भी जाएगी।
फिर घना अंधेरा छावेगा।।2।
वृद्धावस्था तेरी गर्दन हाले,
तेरा सिर भी चक्कर खाएगा।

मन मान जा बुढ़ापा आवेगा।
मन मान जा बुढ़ापा आवेगा।
मन मान जा बुढ़ापा आवेगा।
मन मान जा बुढ़ापा आवेगा।

बिना भजन तेरी होवे दुर्गति,
तू पडा पड़ा पछतावे।

मन मान जा बुढ़ापा आवेगा।
मन मान जा बुढ़ापा आवेगा।

आंखों से तुझे देवे ना दिखाई,
तू खूब देखना चावेगा।।
आखो आगे जाला फिर जा,
जब हाथों नजर बनावेगा।।2।।

मन मान जा बुढ़ापा आवेगा।
मन मान जा बुढ़ापा आवेगा।

बिना भजन तेरी होवे दुर्गति,
तू पडीया-पडीया पछतावेगा।

मन मान जा बुढ़ापा आवेगा।
मन मान जा बुढ़ापा आवेगा।

भाई काना से तुझे देवे ना सुनाई, तू चौकस ध्यान लगावेगा।
भाई काना से तने देवें ना सुनाएं तू चौकस ध्यान लगावेगा।


भाई काना से तने देवें ना सुनाएं तू चौकस ध्यान लगावेगा।2
कान आंख से काम ना चाले,
फिर मू भी गेल्या बावेगा।

मन मान जा बुढ़ापा आवेगा।
मन मान जा बुढ़ापा आवेगा।

मैं तो दे दी बालम बहरे नू।2


मैं तो दे दीबालम  बहरे नू।2
मैं तो दे दी बालम बहरे नू।2

संसारी दी गल्ला चिन्हे,
ना बूझे शब्द जोगहरे नू।।2।।
मुर्दे सेती प्रीत लगावे,
न जाने सतगुरु मेरे नु।

मैं तो दे दी बालम बहरे नू।
मैं तो दे दी बालम बहरे नू।

स्वेत छत्र सिर मुकुट विराजे,
देखत ना उस चेहरे नु।।2 ।।

ऊँची थलिया खेती बोवे,
ये भूल गए निज डेरे नु।।2।।

मैं तो दे दी बालम बहरे नू।2
मैं तो दे दी बालम बहरे नू।2

ये संसार समझदा नाही,
केंदा श्याम दोपहरे नु।।2।।
गरीबदास यह वक्त जात है, रोओगे इस पहरे नूं।।2।।

मैं तो दे दी बालम बहरे नू।
मैं तो दे दी बालम बहरे नू।

ये संसार समझदा नाही,
केंदा श्याम दोपहरे नु।।2।।
गरीबदास यह वक्त जात है, रोओगे इस पहरे नूं।।2।।

मैं तो दे दी बालम बहरे नू।2
मैं तो दे दी बालम बहरे नू।2

चल हंसा सतलोक हमारे

जीव हमारी जाति है, मानव धर्म हमारा। हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई ,धर्म नहीं कोई न्यारा।।

चल हंसा सतलोक हमारे, छोड़ो यह संसारा हो।
चल हंसा सतलोक हमारे, छोड़ो यह संसारा हो।
छोड़ो यह संसारा हो।

इस संसार का काल है राजा,
यो राजा मायाजाल पसारया हो।।2।।
चौदह लोक इसके मुख में बसत है,
ये सबका करें आहारा हो ..2

चल हंसा सतलोक हमारे, छोड़ो यह संसारा हो।
चल हंसा सतलोक हमारे, छोड़ो यह संसारा हो।
छोड़ो यह संसारा हो।

चार बार कोयला कर डारे,
फिर फिर दे अवतारा हो।।2।।
ब्रम्हा, विष्णु, शिव तन धर आये,
फिर ओर का कौन विचारा हो।
ओर का कौन विचारा हो।2

चल हंसा सतलोक हमारे, छोड़ो यह संसारा हो।
चल हंसा सतलोक हमारे, छोड़ो यह संसारा हो।
छोड़ो यह संसारा हो।

सुर नर मुनि जन सब छल भल मारे,
चौरासी में डारिया हो।।2।।
मद आकाश आप जहाँ बैठिया,
वो जोत स्वरूपी उजियारा हो।
वो जोत स्वरूपी उजियारा हो।


चल हंसा उस लोक ,(सतलोक) हमारे, छोड़ो यह संसारा हो।
चल हंसा सतलोक हमारे, छोड़ो यह संसारा हो।
छोड़ो यह संसारा हो।

वाके पार एक ओर नगर है,
जहाँ बरसे अमृत धारा हो।।2।।
स्वेत स्वरूप फूल वहाँ फुले,
हंसा करत विहारा हो।
हँसा करत विहारा हो।

चल हंसा सतलोक हमारे, छोड़ो यह संसारा हो।
चल हंसा सतलोक हमारे, छोड़ो यह संसारा हो।
छोड़ो यह संसारा हो।

कोटि सूर्य चंद्र छिप जावे,
जाके एक रूम चमकारा हो।।2।।
कहे कबीर सुनो धर्मदासा
वह देखो पुरूष दरबार हो।
वह देखो पुरूष दरबार हो।

चल हंसा सतलोक हमारे, छोड़ो यह संसारा हो।
चल हंसा सतलोक हमारे, छोड़ो यह संसारा हो।
छोड़ो यह संसारा हो।

सत साहेब🙏🏻

भगती का महत्व :संत रामपाल जी महाराज


संत रामपाल जी महाराज जो मंत्र देते हैं वह बहुत ही मूल्यवान है उस की मर्यादा में रहकर भक्ति करने से व्यक्ति को मोक्ष प्राप्त होता है।

जो व्यक्ति संत रामपाल जी महाराज से एक बार नाम लेकर उस मंत्र का जाप 1 बार भी करता है और किसी कारणवश भक्ति छोड़ देता है तो भी संत रामपाल जी महाराज उसे किसी ना किसी जन्म में जरूर पार करेंगे।
इन मंत्रों में इतनी शक्ति है कि इससे हमें इस संसार के सभी सुख मिल सकते हैं। मनुष्य जीवन में भक्ति करना अति आवश्यक है मनुष्य जीवन का उद्देश्य है भक्ति करना है 8400000 योनियों में जीव भक्ति नहीं कर सकता है सिर्फ मनुष्य जीवन में ही कर सकता है।
महाभारत में श्रीकृष्ण बताते हैं कि अर्जुन तू भी जन्म मृत्यु में है और मैं भी जन्म मृत्यु में हूं किसी तत्वदर्शी संत की शरण में जाने से ही हमें सही भक्ति मिल सकती है।

संत रामपाल जी महाराज ही पूर्ण परमात्मा है उनकी शरण में आओ और अपना कल्याण करवाएं।


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जीव हमारी जाति है, मानव धर्म हमारा। हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई ,धर्म नहीं कोई न्यारा।।


Sunday, 12 April 2020


हमन
अख़बार बेचने वाला 10 वर्षीय बालक एक मकान का गेट बजा रहा है।
मालकिन - बाहर आकर पूछी क्या है ?
बालक - आंटी जी क्या मैं आपका गार्डेन साफ कर दूं ?
मालकिन - नहीं, हमें नहीं करवाना है, और आज अखबार नही लाया ।
बालक - हाथ जोड़ते हुए दयनीय स्वर में.. "प्लीज आंटी जी करा लीजिये न, अच्छे से साफ करूंगा,आज अखबार नही छपा,कल छुट्टी थी दशहरे की ।"
मालकिन - द्रवित होते हुए "अच्छा ठीक है, कितने पैसा लेगा ?"
बालक - पैसा नहीं आंटी जी, खाना दे देना।"
मालकिन- ओह !! आ जाओ अच्छे से काम करना ।
(लगता है बेचारा भूखा है पहले खाना दे देती हूँ..मालकिन बुदबुदायी।)



मालकिन- ऐ लड़के..पहले खाना खा ले, फिर काम करना ।
बालक -नहीं आंटी जी, पहले काम कर लूँ फिर आप खाना दे देना।
मालकिन - ठीक है, कहकर अपने काम में लग गयी।
बालक - एक घंटे बाद "आंटी जी देख लीजिए, सफाई अच्छे से हुई कि नहीं।
मालकिन -अरे वाह! तूने तो बहुत बढ़िया सफाई की है, गमले भी करीने से जमा दिए। यहां बैठ, मैं खाना लाती हूँ।
जैसे ही मालकिन ने उसे खाना दिया, बालक जेब से पन्नी निकाल कर उसमें खाना रखने लगा।
मालकिन - भूखे काम किया है, अब खाना तो यहीं बैठकर खा ले। जरूरत होगी तो और दे दूंगी।
बालक - नहीं आंटी, मेरी बीमार माँ घर पर है,सरकारी अस्पताल से दवा तो मिल गयी है,पर डाॅ साहब ने कहा है दवा खाली पेट नहीं खाना है।
मालकिन की पलके गीली हो गई..और अपने हाथों से मासूम को उसकी दूसरी माँ बनकर खाना खिलाया फिर उसकी माँ के लिए रोटियां बनाई और साथ उसके घर जाकर उसकी माँ को रोटियां दे आयी । और आते आते कह कर आयी "बहन आप बहुत अमीर हो जो दौलत आपने अपने बेटे को दी है वो हम अपने बच्चों को नहीं दे पाते हैं" ।
माँ बेटे की तरफ डबडबाई आंखों से देखे जा रही थी...बेटा बीमार मां से लिपट गया...
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Tuesday, 7 April 2020

कहानी स्टोरी Story: Rohtak Haryana रोहतक हरियाणा

रोहतक की दुखद घटना !

राधिका और नवीन को आज तलाक के कागज मिल गए थे। दोनो साथ ही कोर्ट से बाहर निकले। दोनो के परिजन साथ थे और उनके चेहरे पर विजय और सुकून के निशान साफ झलक रहे थे। चार साल की लंबी लड़ाई के बाद आज फैसला हो गया था।
दस साल हो गए थे शादी को मग़र साथ मे छः साल ही रह पाए थे।
चार साल तो तलाक की कार्यवाही में लग गए।
राधिका के हाथ मे दहेज के समान की लिस्ट थी जो अभी नवीन के घर से लेना था और नवीन के हाथ मे गहनों की लिस्ट थी जो राधिका से लेने थे।

साथ मे कोर्ट का यह आदेश भी था कि नवीन  दस लाख रुपये की राशि एकमुश्त राधिका को चुकाएगा।

राधिका और नवीन दोनो एक ही टेम्पो में बैठकर नवीन के घर पहुंचे।  दहेज में दिए समान की निशानदेही राधिका को करनी थी।
इसलिए चार वर्ष बाद ससुराल जा रही थी। आखरी बार बस उसके बाद कभी नही आना था उधर।

सभी परिजन अपने अपने घर जा चुके थे। बस तीन प्राणी बचे थे।नवीन, राधिका और राधिका की माता जी।

नवीन घर मे अकेला ही रहता था।  मां-बाप और भाई आज भी गांव में ही रहते हैं।

राधिका और नवीन का इकलौता बेटा जो अभी सात वर्ष का है कोर्ट के फैसले के अनुसार बालिग होने तक वह राधिका के पास ही रहेगा। नवीन महीने में एक बार उससे मिल सकता है।
घर मे परिवेश करते ही पुरानी यादें ताज़ी हो गई। कितनी मेहनत से सजाया था इसको राधिका ने। एक एक चीज में उसकी जान बसी थी। सब कुछ उसकी आँखों के सामने बना था।एक एक ईंट से  धीरे धीरे बनते घरोंदे को पूरा होते देखा था उसने।
सपनो का घर था उसका। कितनी शिद्दत से नवीन ने उसके सपने को पूरा किया था।
नवीन थकाहारा सा सोफे पर पसर गया। बोला "ले लो जो कुछ भी चाहिए मैं तुझे नही रोकूंगा"
राधिका ने अब गौर से नवीन को देखा। चार साल में कितना बदल गया है। बालों में सफेदी झांकने लगी है। शरीर पहले से आधा रह गया है। चार साल में चेहरे की रौनक गायब हो गई।

वह स्टोर रूम की तरफ बढ़ी जहाँ उसके दहेज का अधिकतर  समान पड़ा था। सामान ओल्ड फैशन का था इसलिए कबाड़ की तरह स्टोर रूम में डाल दिया था। मिला भी कितना था उसको दहेज। प्रेम विवाह था दोनो का। घर वाले तो मजबूरी में साथ हुए थे।
प्रेम विवाह था तभी तो नजर लग गई किसी की। क्योंकि प्रेमी जोड़ी को हर कोई टूटता हुआ देखना चाहता है।
बस एक बार पीकर बहक गया था नवीन। हाथ उठा बैठा था उसपर। बस वो गुस्से में मायके चली गई थी।
फिर चला था लगाने सिखाने का दौर । इधर नवीन के भाई भाभी और उधर राधिका की माँ। नोबत कोर्ट तक जा पहुंची और तलाक हो गया।

न राधिका लोटी और न नवीन लाने गया।

राधिका की माँ बोली" कहाँ है तेरा सामान? इधर तो नही दिखता। बेच दिया होगा इस शराबी ने ?"

"चुप रहो माँ"
राधिका को न जाने क्यों नवीन को उसके मुँह पर शराबी कहना अच्छा नही लगा।

फिर स्टोर रूम में पड़े सामान को एक एक कर लिस्ट में मिलाया गया।
बाकी कमरों से भी लिस्ट का सामान उठा लिया गया।
राधिका ने सिर्फ अपना सामान लिया नवीन के समान को छुवा भी नही।  फिर राधिका ने नवीन को गहनों से भरा बैग पकड़ा दिया।
नवीन ने बैग वापस राधिका को दे दिया " रखलो, मुझे नही चाहिए काम आएगें तेरे मुसीबत में ।"




गहनों की किम्मत 15 लाख से कम नही थी।
"क्यूँ, कोर्ट में तो तुम्हरा वकील कितनी दफा गहने-गहने चिल्ला रहा था"
"कोर्ट की बात कोर्ट में खत्म हो गई, राधिका। वहाँ तो मुझे भी दुनिया का सबसे बुरा जानवर और शराबी साबित किया गया है।"
सुनकर राधिका की माँ ने नाक भों चढ़ाई।

"नही चाहिए।
वो दस लाख भी नही चाहिए"

 "क्यूँ?" कहकर नवीन सोफे से खड़ा हो गया।

"बस यूँ ही" राधिका ने मुँह फेर लिया।

"इतनी बड़ी जिंदगी पड़ी है कैसे काटोगी? ले जाओ,,, काम आएगें।"

इतना कह कर नवीन ने भी मुंह फेर लिया और दूसरे कमरे में चला गया। शायद आंखों में कुछ उमड़ा होगा जिसे छुपाना भी जरूरी था।

राधिका की माता जी गाड़ी वाले को फोन करने में व्यस्त थी।

राधिका को मौका मिल गया। वो नवीन के पीछे उस कमरे में चली गई।

वो रो रहा था। अजीब सा मुँह बना कर।  जैसे भीतर के सैलाब को दबाने दबाने की जद्दोजहद कर रहा हो। राधिका ने उसे कभी रोते हुए नही देखा था। आज पहली बार देखा न जाने क्यों दिल को कुछ सुकून सा मिला।

मग़र ज्यादा भावुक नही हुई।




सधे अंदाज में बोली "इतनी फिक्र थी तो क्यों दिया तलाक?"

"मैंने नही तलाक तुमने दिया"

"दस्तखत तो तुमने भी किए"

"माफी नही माँग सकते थे?"

"मौका कब दिया तुम्हारे घर वालों ने। जब भी फोन किया काट दिया।"

"घर भी आ सकते थे"?

"हिम्मत नही थी?"

राधिका की माँ आ गई। वो उसका हाथ पकड़ कर बाहर ले गई। "अब क्यों मुँह लग रही है इसके? अब तो रिश्ता भी खत्म हो गया"

मां-बेटी बाहर बरामदे में सोफे पर बैठकर गाड़ी का इंतजार करने लगी।
राधिका के भीतर भी कुछ टूट रहा था। दिल बैठा जा रहा था। वो सुन्न सी पड़ती जा रही थी। जिस सोफे पर बैठी थी उसे गौर से देखने लगी। कैसे कैसे बचत कर के उसने और नवीन ने वो सोफा खरीदा था। पूरे शहर में घूमी तब यह पसन्द आया था।"

फिर उसकी नजर सामने तुलसी के सूखे पौधे पर गई। कितनी शिद्दत से देखभाल किया करती थी। उसके साथ तुलसी भी घर छोड़ गई।

घबराहट और बढ़ी तो वह फिर से उठ कर भीतर चली गई। माँ ने पीछे से पुकारा मग़र उसने अनसुना कर दिया। नवीन बेड पर उल्टे मुंह पड़ा था। एक बार तो उसे दया आई उस पर। मग़र  वह जानती थी कि अब तो सब कुछ खत्म हो चुका है इसलिए उसे भावुक नही होना है।

उसने सरसरी नजर से कमरे को देखा। अस्त व्यस्त हो गया है पूरा कमरा। कहीं कंही तो मकड़ी के जाले झूल रहे हैं।



कितनी नफरत थी उसे मकड़ी के जालों से?

फिर उसकी नजर चारों और लगी उन फोटो पर गई जिनमे वो नवीन से लिपट कर मुस्करा रही थी।
कितने सुनहरे दिन थे वो।

इतने में माँ फिर आ गई। हाथ पकड़ कर फिर उसे बाहर ले गई।



बाहर गाड़ी आ गई थी। सामान गाड़ी में डाला जा रहा था। राधिका सुन सी बैठी थी। नवीन गाड़ी की आवाज सुनकर बाहर आ गया।
अचानक नवीन कान पकड़ कर घुटनो के बल बैठ गया।
बोला--" मत जाओ,,, माफ कर दो"
शायद यही वो शब्द थे जिन्हें सुनने के लिए चार साल से तड़प रही थी। सब्र के सारे बांध एक साथ टूट गए। राधिका ने कोर्ट के फैसले का कागज निकाला और फाड़ दिया ।
और मां कुछ कहती उससे पहले ही लिपट गई नवीन से। साथ मे दोनो बुरी तरह रोते जा रहे थे।
दूर खड़ी राधिका की माँ समझ गई कि
कोर्ट का आदेश दिलों के सामने कागज से ज्यादा कुछ नही।
काश उनको पहले मिलने दिया होता?

                 ➤ अगर माफी मांगने से ही रिश्ते टूटने से बच जाए, तो माफ़ी मांग लेनी चाहिए  

जिसने तेरी रक्षा जठराग्नि में की वह है पूर्ण परमात्मा वह है समरथ साहेब।

जिसने तेरी रक्षा जठराग्नि में की वह है पूर्ण परमात्मा वह है समरथ साहेब।  मां के कोख में जहां बच्चा पलता है वहां उसकी कोई और रक्षा नही...