Wednesday, 20 March 2019

मरने के बाद जीव के साथ क्या होता है।

जीव हमारी जाति है, मानव धर्म हमारा। हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई ,धर्म नहीं कोई न्यारा।।

मरने के बाद क्या होता है ,????????
श्री गरुण पुराण कि यह बात -.-
मृत्यु एक ऐसा सच है जिसे कोई भी झुठला नहीं सकता ।

मृत्यु के बाद जीवात्मा यमलोक तक किस प्रकार जाती है, इसका विस्तृत वर्णन गरुड़ पुराण में है। किस प्रकार मनुष्य के प्राण निकलते हैं और किस तरह वह पिंडदान प्राप्त कर प्रेत का रूप लेता है।

(इसका वर्णन गरूण पुराण पृष्ट 370 से आगे तक आता है)

* जिस मनुष्य की मृत्यु होने वाली होती है, वह बोल नहीं पाता है। अंत समय में उसमें दिव्य दृष्टि उत्पन्न होती है और वह संपूर्ण संसार को एकरूप समझने लगता है । उसकी सभी इंद्रियां नष्ट हो जाती हैं। वह जड़ अवस्था में आ जाता है, यानी हिलने-डुलने में असमर्थ हो जाता है। इसके बाद उसके मुंह से झाग निकलने लगता है और लार टपकने लगती है । पापी पुरुष के प्राण नीचे के मार्ग से निकलते हैं ।
* मृत्यु के समय दो यमदूत आते हैं । वे बड़े भयानक, क्रोधयुक्त नेत्र वाले तथा पाशदंड धारण किए होते हैं । वे नग्न अवस्था में रहते हैं और दांतों से कट-कट की ध्वनि करते हैं । यमदूतों के कौए जैसे काले बाल होते हैं । उनका मुंह टेढ़ा-मेढ़ा होता है । नाखून ही उनके शस्त्र होते हैं। इन दूतों को देखकर प्राणी भयभीत होकर मलमूत्र त्याग करने लग जाता है। उस समय शरीर से अंगूष्ठमात्र (अंगूठे के बराबर) जीव हा हा शब्द करता हुआ निकलता है।
* यमराज के दूत जीवात्मा के गले में पाश बांधकर यमलोक ले जाते हैं। उस पापी जीवात्मा को रास्ते में थकने पर भी दूत भयभीत करते हैं और उसे नरक में मिलने वाली यातनाओं के बारे में बताते हैं । ऐसी भयानक बातें सुनकर पापात्मा जोर-जोर से रोने लगती है, किंतु उस पर बिल्कुल भी दया नहीं करते हैं ।
* इसके बाद वह अंगूठे के बराबर शरीर यमदूतों से डरता और कांपता हुआ, कुत्तों के काटने से दु:खी अपने पापकर्मों को याद करते हुए चलता है। आग की तरह गर्म हवा तथा गर्म बालू पर वह जीव चल नहीं पाता है । वह भूख-प्यास से भी व्याकुल हो उठता है । उसकी पीठ पर चाबुक मारते हुए उसे आगे ले जाते हैं। वह जीव जगह-जगह गिरता है और बेहोश हो जाता है। उसको अंधकारमय मार्गसे ले जाते हैं।
* यमलोक . पापी जीव को दो- तीन मुहूर्त में ले जाते हैं। इसके बाद उसे भयानक यातना देते हैं। यह भोगने के बाद यमराज की आज्ञा से यमदूत आकाशमार्ग से पुन: उसे उसके घर छोड़ आते हैं।


* घर में आकर वह जीवात्मा अपने शरीर में पुन: प्रवेश करने की इच्छा रखती है, लेकिन यमदूत के पाश से वह मुक्त नहीं हो पाती और भूख-प्यास के कारण रोती है। पुत्र आदि जो पिंड और अंत समय में दान करते हैं, उससे भी प्राणी की तृप्ति नहीं होती, क्योंकि पापी पुरुषों को दान, श्रद्धांजलि द्वारा तृप्ति नहीं मिलती। इस प्रकार भूख-प्यास से बेचैन होकर वह जीव यमलोक जाता है।
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* जिस पापात्मा के पुत्र आदि पिंडदान नहीं देते हैं तो वे प्रेत रूप हो जाती हैं और लंबे समय तक निर्जन वन में दु:खी होकर घूमती रहती है(ध्यान दीजियेगा भूत पूजा पिंड पूजा करना मना किया है गीताजी मे ,इसे करने से ,पिंड दान करने वाला भी भूत बनता है, ये शास्त्र विरुद्ध पूजा है ,ये वर्णन गरूण पुराण अनुसार बताया जारहा है इसलिए इसका लेख लिखा है )। काफी समय बीतने के बाद भी कर्म को भोगना ही पड़ता है, क्योंकि प्राणी नरक यातना भोगे बिना मनुष्य शरीर नहीं प्राप्त होता। मनुष्य की मृत्यु के बाद 10 दिन तक पिंडदान किया जाता है । उस पिंडदान के प्रतिदिन चार भाग हो जाते हैं। उसमें दो भाग तो पंचमहाभूत देह को पुष्टि देने वाले होते हैं, तीसरा भाग यमदूत का होता है तथा चौथा भाग प्रेत खाता है। नवें दिन पिंडदान करने से प्रेत का शरीर बनता है। दसवें दिन पिंडदान देने से उस शरीर को चलने की शक्ति प्राप्त होती है।



• शव को जलाने के बाद पिंड से हाथ के बराबर का शरीर उत्पन्न होता है । वही यमलोक के मार्ग में शुभ-अशुभ फल भोगता है। पहले दिन पिंडदान से मूर्धा (सिर), दूसरे दिन गर्दन और कंधे, तीसरे दिन से हृदय, चौथे दिन के पिंड से पीठ, पांचवें दिन से नाभि, छठे और सातवें दिन से कमर और नीचे का भाग, आठवें दिन से पैर, नवें और दसवें दिन से भूख-प्यास उत्पन्न होती है । यह पिंड शरीर को धारण कर भूख-प्यास से व्याकुल प्रेतरूप में ग्यारहवें और बारहवें दिन का भोजन करता है ।

* यमदूतों द्वारा तेरहवें दिन प्रेत को बंदर की तरह पकड़ लिया जाता है । इसके बाद वह प्रेत भूख-प्यास से तड़पता हुआ यमलोक अकेला ही जाता है। यमलोक तक पहुंचने का रास्ता वैतरणी नदी को छोड़कर छियासी हजार योजन है(इसका प्रमाण गरूण पुराण गीताप्रेस से प्रकाशित  पृष्ट 460 मे है)

। उस मार्ग पर प्रेत प्रतिदिन दो सौ योजन चलता है । इस प्रकार 47 दिन लगातार चलकर वह यमलोक पहुंचता है । मार्ग में सोलह पुरियों को पार कर यमराज के घर जाता है।

* इन सोलह पुरियों के नाम इस प्रकार है - सौम्य, सौरिपुर, नगेंद्रभवन, गंधर्व, शैलागम, क्रौंच, क्रूरपुर, विचित्रभवन, बह्वापाद, दु:खद, नानाक्रंदपुर, सुतप्तभवन, रौद्र, पयोवर्षण, शीतढ्य, बहुभीति । इन सोलह पुरियों को पार करने के बाद प्राणी यमपाश में बंधा मार्ग में हाहाकार करते हुए यमराज पुरी जाता है । ( सोलह पुरियों का वर्णन गरूण पुराण गीताप्रेस से प्रकाशित पृष्ट 427 मे दिया हुआ है)

----------गरीबदास जिकी वाणी  मे नर्ग का वर्णन------------

ये वर्णन गरुड़पुराण के पृष्ट 376 गीताप्रेस से प्रकाशित से

मिलते है तथा आगे लिखे वर्णन से भी मिलती है इससे ये साबित होता है कि गरीबदास जिको भी सर्व शास्त्रो का ज्ञान था।। पढ़े गरीबदास जीकी वाणी मे

गरीब, जम किंकर के धाम कूं, साईं न ले
जाय |
 बड़ी भयंकर मार है, सतगुरु करै
सहाय ||
गरीब, कारे कारे किंगरे, नीला जम
का धाम |
 जेते जामे जीव है, नहीं चैन
विश्राम ||
गरीब, है तांबे की धरतरी, चोरासी मध
कुंड |
आदि अंत के जिव जित, होते रुंडक मुंड
||
गरीब, चोरासी जहाँ कुंड हैं, खंभ अनंत
अपार |
करनी भुगते आपनी,
नाना बिधि की मार ||
गरीब, चोदा कोटि भयंकरम,
चोदा मुनि दिवान |
कोटि कोटि ताबै
किये, साईं का फुरमान ||
गरीब, रुधिर भरे जहाँ कुंड हैं,
कुंभी जिनका नाम |
दवारा हैं मुख लोड
का, बड़ा भयंकर धाम ||
गरीब, सो सो योजन कुंड है, गिरद
गता बहु भीर |
कोट्यो जिव उसारिये,
कहिं न पावै थीर ||
गरीब, हाथ पैर जिनके नहीं, नहीं सीस मुख
द्वार | तलछू माछू होत हैं, परै गैब
की मार ||
गरीब, लघुसी बानी कहत हूँ, दीरघ
कही न जाय |
 जम किंकर की मार से, साईं
लेत छुड़ाय ||
गरीब, नीले जिनके होंठ हैं,
काली जिनकी जीभ |
चिसमे जिनके लाल
है, रक्त टपकै पीव ||
गरीब, सूर स्वान के मुख बने, धड़
तो जिनकी देह |
दस्तो जिनके गुर्ज हैं,
मारे निर संदेह ||
गरीब, स्याम वर्ण शंका नही, दागड दुम
खलील |
उरध चुंच मुख काग का, चिसमे
जिनके नील ||
गरीब, शक्ति सरुपी तन धरै, लघु दीरघ
हो जाहिं |
बाहर भीतर मार हैं, तन कूं
बहु विधि खाहिं ||
गरीब, कोटि-कोटि की जोट हैं, कोटि-
कोटि एक संग |।
एका-एकी फिरत है, ऐस भयंकर अंग ||


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